प्रधानमंत्री ने विकसित भारत 2047 के लिए शासन संबंधी सबक पर एक लेख साझा किया
प्रधानमंत्री ने 'विकसित भारत 2047' की धारा में शासन पद्धति से जुड़े महत्वपूर्ण अनुभवों को प्रकाशित किया है। इस लेख में भविष्य के भारत की नींव बनने वाली प्रशासनिक सुधारों और नागरिकों की प्रगतिशील भागीदारी पर जोर दिया गया है।
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शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2026 को, राष्ट्रीय स्तर पर एक अहम विचार-विमर्श का आगाज करते हुए, प्रधानमंत्री ने ‘विकसित भारत 2047’ के दृष्टि-चित्र के संदर्भ में शासन संबंधी महत्वपूर्ण सबक साझा किए। उन्होंने अपने ताजा प्रकाशित लेख में इस बात पर विशेष बल दिया कि आगामी दशकों में भारत की प्रगति केवल आर्थिक संख्याओं तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि यह प्रभावी, पारदर्शी और जन-केंद्रित शासन पर निर्भर करेगी। प्रधानमंत्री का यह लेख देश के प्रशासनिक ढांचे को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए एक मार्गदर्शक दस्तावेज के रूप में भी देखा जा रहा है।
लेख में, प्रधानमंत्री ने तर्क दिया है कि 2047 तक विकसित भारत बनना एक सांकेतिक लक्ष्य नहीं, बल्कि एक व्यावहारिक अहिंसा और प्रभावी कार्यान्वयन की कला है। उन्होंने यह स्पष्ट किया है कि शासन की प्रक्रिया में नागरिकों की भागीदारी को और भी गहन बनाया जाना चाहिए, जिससे नीति निर्माण के प्रत्येक चरण में जनता की स्वरुप और आवश्यकताओं की सीधी छाप पड़े। उन्होंने उल्लेख किया कि नौकरशाही का ढांचा अधिक लचीला और अनुकूल होना चाहिए, जो तकनीकी उन्नयन को अपनाते हुए नागरिकों की समस्याओं के समाधान में तेजी ला सके।
विशेष रूप से, प्रधानमंत्री ने डिजिटल शासन और डेटा-आधारित निर्णय लेने की महत्वपूर्ण भूमिका पर चर्चा की। उनका मानना है कि आधुनिक तकनीकों का उपयोग करके शासन को अधिक सटीक और समयबद्ध बनाया जा सकता है, जिससे सार्वजनिक सेवाओं का वितरण अधिक समान और कुशल हो सके। उन्होंने यह भी कहा कि भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए न केवल कानूनी प्रक्रियाओं को मजबूत किया जाना चाहिए, बल्कि एक ऐसे संस्कृति को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए जहां पारदर्शिता और जवाबदेही प्राथमिकता हो।
इस लेख का प्रकाशन ऐसे समय में हुआ है जब देश 'विकसित भारत 2047' की दिशा में अहम कदम उठा रहा है। विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं का कहना है कि प्रधानमंत्री द्वारा साझा किए गए ये तर्क प्रशासनिक सुधारों की नई दिशा तय करने में सहायक होंगे। उन्होंने इस लेख को ‘शासन की नई परिभाषा’ के रूप में वर्णित किया है, जिसमें नागरिकों को केवल लाभार्थी नहीं, बल्कि शासन की प्रक्रिया के सक्रिय भागीदार के रूप में देखने की पेशकश की गई है।
प्रधानमंत्री ने समापन में देशवासियों से अपील की कि वे इस प्रक्रिया में अपने-अपने स्तर पर योगदान दें और एक ऐसे समाज के निर्माण में सहयोग करें जो न केवल समृद्ध हो, बल्कि न्यायपूर्ण और समावेशी भी हो। उनका यह लेख आने वाले समय में नीतिगत चर्चाओं को नई दिशा देगा और विभिन्न विभागों को प्रशासनिक कार्यप्रणाली में सुधार लाने के लिए प्रेरित करेगा। यह लेख भारत के भविष्य के लिए एक सशक्त संदेश है कि शासन की गुणवत्ता ही राष्ट्र की शक्ति का वास्तविक मापक है।