मोदी सरकार को नियमों का पालन करना चाहिए, नागरिकों के खिलाफ शक्ति का दुरुपयोग नहीं | द हिंदू संपादकीय
10 अक्टूबर के प्रदर्शन के बाद शांतिपूर्ण सभा के मौलिक अधिकार और राज्य के अधिकारों की सीमाओं पर चर्चाएं खaim हो गई हैं। सैकड़ों प्रदर्शनकारियों, छात्रों और नेताओं को गिरफ्तार करके या उनके यात्रा प्रतिबंध लगाकर सरकार ने नागरिकों के खिलाफ शक्ति का दुरुपयोग किया है, जिससे संवैधानिक मानदंडों का पालन करने की मांग जोरों पर उठी है।
Journalism India··1 व्यूज़·3 मिनट पढ़ें
10 अक्टूबर को हुए प्रदर्शन की घटनाक्रम ने भारत के संवैधानिक ढांचे में मौलिक अधिकारों, विशेष रूप से शांतिपूर्ण सभा करने के अधिकार और राज्य की शक्तियों की सीमाओं के बीच के तनाव को फिर से सतह पर ला दिया है। इस घटना के तुरंत बाद, हज़ारों सक्रिय, छात्र, राजनीतिक नेता और आम प्रदर्शनकारियों को लक्ष्य बनाते हुए प्रशासन के द्वारा किए गए उपायों—जिनमें गिरफ्तारी, यात्रा प्रतिबंध और व्यापक सुरक्षा कदम शामिल हैं—ने देशभर में तीव्र विवाद की जड़ें मजबूत कर दी हैं। इस पूरे संदर्भ में, इस बात पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं कि क्या केंद्र सरकार संवैधानिक नैतिकता का पालन कर रही है या फिर नागरिकों के खिलाफ अपनी शक्ति का दुरुपयोग कर रही है।
भारतीय संविधान की धारा 19(1)(b) नागरिकों को शांतिपूर्ण और हथियाररहित सभा करने का मौलिक अधिकार देती है। हालांकि, यह अधिकार निरपेक्ष नहीं है और राज्य को महानुभूति, सार्वजनिक व्यवस्था या अन्य नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए उचित और आवश्यक प्रतिबंध लगाने की अनुमति है। लेकिन 10 अक्टूबर की घटनाओं में प्रशासन की प्रतिक्रिया ने इस संतुलन को तोड़ दिया है। जबकि प्रदर्शनकारियों ने अपनी बात रखने का संवैधानिक मार्ग अपनाया, प्रशासन ने इसका जवाब भारी हाथों से दिया। छात्रों और सक्रियों को अचानक गिरफ्तार करना, उनके यात्रा प्रतिबंध लगा देना और सुरक्षा बलों का अतिक्रमणशील व्यवहार यह संकेत देता है कि सरकार ने इस प्रदर्शन को किसी भी कीमत पर विफल करने का इरादा रखा था, चाहे इसके लिए मौलिक अधिकारों की कुर्बानी क्यों न हो।
राजनीतिक विश्लेषकों और कानून विशेषज्ञों का मानना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में अधिकारियों का देशांतर नहीं होता है, बल्कि वह कानून के भरोसे में होता है। जब सरकार नागरिकों के खिलाफ शक्ति का दुरुपयोग करती है, तो वह अपने ही लोकतांत्रिक नींव को हिला देती है। 10 अक्टूबर के प्रदर्शन के दौरान किए गए कदमों ने यह प्रश्न उठाया है कि क्या प्रशासन अपनी शक्तियों का उपयोग कानून के पक्ष में कर रहा है या फिर विरोध की आवाज़ें चुप कराने के लिए? गिरफ्तार किए गए हज़ारों नागरिकों की स्थिति, जिनमें कई छात्र और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हैं, ने समाज में एक गहरी चिंता पैदा की है। यात्रा प्रतिबंध और सुरक्षा कदमों का इस्तेमाल, जो सामान्यतः अपराध या गंभीर धमकी के मामलों में किया जाता है, को एक सामाजिक-राजनीतिक प्रदर्शन पर लागू करना एक अलगाववादी और डरावनी प्रवृत्ति को दर्शाता है।
मोदी सरकार को समझना होगा कि लोकतंत्र में 'नियमों का पालन' करना ही सबसे बड़ा कर्तव्य है। शक्ति का दुरुपयोग नागरिकों के खिलाफ नहीं, बल्कि उनके अधिकारों की रक्षा के लिए होना चाहिए। जब तक सरकार संवैधानिक मानदंडों की पालना करती है और प्रदर्शन के अधिकार को मान्यता देती है, तब तक देश में राजनीतिक स्थिरता और नागरिक विश्वास बना रहेगा। 10 अक्टूबर की घटनाएं एक चेतावनी बेलें हैं कि अगर प्रशासनिक अधिकारों का दुरुपयोग जारी रहा, तो नागरिकों और राज्य के बीच का संवैधानिक समझौता खतरे में पड़ सकता है। सरकार को अब अपने रुख में बदलाव लाते हुए, नागरिकों के मौलिक अधिकारों का सम्मान करना होगा और इस बात का प्रमाण देना होगा कि वह कानून के सिद्धांतों के पक्ष में खड़ी है, न कि शक्ति के दुरुपयोग के पक्ष में।